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अब नही होता पहाड़ों में बेडा नाच-देखें वीडियो बेडा नाच का

बिंदुली रात रैगी जरा सी बेडा नाच करते हुए  नृत्य-गायन की इस परंपरा की अब पहाड़ में लगभग मत्यु हो चुकी है। यादगार के लिए कुछ लोग मं...

बिंदुली रात रैगी जरा सी



बेडा नाच करते हुए 

नृत्य-गायन की इस परंपरा की अब पहाड़ में लगभग मत्यु हो चुकी है। यादगार के लिए कुछ लोग मंचों पर या साक्षात्कार के लिए ही इसका प्रदर्शन करते हैं। वे भी इसी कला से जुडी़ जाति के लोग।



इस कला को बेडा(बाद् दी) नृत्य कहा जाता है। किसी भी समसामयिक अथवा ऐतिहासिक घटना पर गीत बनाकर शादी समारोह इत्यादि अवसरों पर प्रस्तुत करने वाले लोगों का एक वर्ग पहाड़ में बेडा अथवा बाद् दी कहलाता है। इनका बाद् दी नामकरण शायद वादन कला के कारण हुआ हो। ये पहाड़ के आशुकवि रहे हैं।
ये न केवल एक समय में यहां मनोरंजन के प्रमुख माध्यम रहे, अपितु संदेश वाहक और इतिहास के प्रस्तोता भी रहे। एक स्त्री और एक पुरुष का इनका गायन लोगों को लंबे समय तक मोहपाश में बांधने की शक्ति रखता है। पुरुष ढोलक बजाते हुए गाता है और महिला नृत्य करते हुए पुरुष गायक का साथ देकर गायन को विस्तार देती है। वह घाघरा पहनती है और पैरों पर घुंघरू बंधे होते हैं। इस दौरान दर्शक इनको पैसे देते हैं। नृत्यांगना को बादीण या बेडीण कहा जाता है। पहाड़ में 'मेरा बाजू रंगारंग बिचारी रंग ले दी मोल' और 'राणा सत्येसिंग' जैसे गीतों की प्रसिद्धि के पीछे इसी वर्ग का हाथ है। सन् 1956 में आई सतपुली की विनाशकारी बाढ़ की घटना को भी
इन लोगों ने अपनी कला के माध्यम से खूब प्रसारित किया। इस वर्ग के अधिकांश गीत शृंगार रस आधारित होते हैं। 
सामाजिक जागरूकता और लिखाई-पढा़ई के कारण अब यह वर्ग इस कला से विमुख हो गया है। अब पहाड़ में शायद ही ऐसे लोग हों, जो इस कला का संवहन कर आजीविका जुटा रहे हों। 2002 में गढ़वाली लोकसाहित्य पर शोध के दौरान मैं नैलचामी जैसे कुछ क्षेत्रों में इन लोगों के साक्षात्कार लेने गया। उस दौरान ही यह कला मृत्यु शैया पर जा चुकी थी। मयाली गांव के एक बेडा शिवजनी से मैंने इसी संदर्भ में एक प्रश्न किया था। उनका उत्तर था-माराज..मेरे दो बेटे मुंबई में नौकरी करते हैं। महीने में खूब खर्चा भेजते हैं और मुझे कहते हैं कि पिताजी,ये वादन-गायन वाला धंधा छोड़ दो।....और ठाकुरो बात भी सही है हम दो-चार रुपये की खातिर क्यों पचास लोगों के सामने अपनी जनानी को नचवाएं। 
शिवजनी की बातों में दम और सच था।
वैसे दु:खद परिणति यह रही की इस कला पर पहाड़ में अपेक्षित कार्य नहीं हुआ है। ओएनजीसी ने दो साल पहले इस पर एक शोधात्मक कार्यक्रम किया, डोक्यूमेंट्री भी बनाई गई, परंतु  उसमें संचालन हिंदी में था। साक्षात्कारकर्ता कलाकारों से हिंदी में ही प्रश्न पूछ रहा था, कलाकारों की भी हिंदी में जवाब देना मजबूरी थी। इसलिए मेरे हिसाब से यह कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया।
वैसे गढ़वाल की संस्कृति के विशेषज्ञ प्रो.दाताराम पुरोहित ने इस कला पर स्तुत्य कार्य किया है। राधाखंडी की गायिका बचनदेई और उनके पति शिवजनी(ग्यारहगांव, हिंदाव, टिहरी गढ़वाल निवासी) को प्रो.पुरोहित ने न केवल मंच मुहैया करवाए, अपितु उन्हें पहचान भी दिलाई। बचनदेई और शिवजनी दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं।
-डा.वीरेन्द्र बर्त्वाल, देहरादून

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