उत्तराखंड में कहां है पितरों का सुप्रीम कोर्ट -देखिए पूरी जानकारी

'ब्रह्मकपाल' पितरों का सुप्रीम कोर्ट ! -- पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए श्राद्ध पक्ष में हर साल लोग करते हैं पिंडदान व तर्पण...




ग्राउंड जीरो से संजय चौहान! 

हिंदुओ के सर्वोच्च तीर्थ बैकुंठ धाम बद्रीनाथ में श्राद्ध पक्ष के दौरान हर साल देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर ब्रहकपाल में अपने पितरों का तर्पण करतें हैं। हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर आश्विन अमावस्या तक लाखों हिंदू धर्मावलंबी अपने पूर्वजों की पितृ योनि में भटकती हुई आत्मा को मुक्ति मोक्ष के लिए पिंडदान व तर्पण के लिए ब्रह्मकपाल आते हैं। जो यहां पहुंचकर अपने पितरों का तर्पण करते हैं।


मान्यता है कि विश्व में एकमात्र श्री बदरीनाथ धाम ही ऐसा है जहां ब्रह्मकपाल तीर्थ में पिंडदान के बाद पितृ मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। यहां पर पितरों का उद्धार होता है। इसलिए इसे पितरों की मोक्ष प्राप्ति का सुप्रीम कोर्ट कहा जाता है। ब्रह्मकपाल के बाद कहीं भी पिंडदान करने की आवश्यकता नहीं है। पिंडदान लिए पुष्कर, हरिद्वार, प्रयाग, काशी, गया प्रसिद्ध हैं लेकिन ब्रह्मकपाल में किया गया पिंडदान आठ गुना फलदायी है। माना जाता है कि श्राद्ध पक्ष में ब्रह्मकपाल में पितर तर्पण करने से वंश वृद्धि होती है। 


 पुराणों में लिखा है... 

‘‘आयुः प्रजां धनं विद्यां, स्वर्गं मोक्ष सुखानि च। 

प्रयच्छति तथा राज्यं पितरः मोक्षतर्पिता।। 


मान्यता है कि जब ब्रह्मा ने अपनी पुत्री प्रथ्वी पर गलत दृष्टि डाली तो, शिव ने त्रिशूल से ब्रह्मा का एक सिर धड़ से अलग कर दिया। ब्रह्मा का यह सिर शिव के त्रिशूल पर चिपक गया और उन्हें ब्रह्महत्या का पाप भी लगा था। महादेव शिव इस पाप के निवारण के लिए संपूर्ण आर्यावर्त भारत भूमि के अनेक तीर्थ स्थानों पर गये परंतु फिर भी इस जघन्य पाप से मुक्ति नहीं मिली। जब वे अपने धाम कैलास पर जा रहे थे तो बद्रीकाश्रम में अलकापुरी कुबेर नगरी से आ रही मां अलकनंदा में स्नान करके भगवान शिव बद्रीनाथ धाम की ओर बढ़ने लगे कि 200 मी. पूर्व ही एक चमत्कार हुआ। ब्रह्माजी का पांचवां सिर उनके हाथ से वहीं नीचे गिर गया। बद्रीनाथ धाम के समीप जिस स्थान पर वह सिर (कपाल) गिरा वह स्थान ब्रह्मकपाल कहलाया और भगवान देवाधिदेवमहादेव को इसी स्थान पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली। 


यही नहीं जब महाभारत के युद्ध में पांडवों ने अपने ही बंधु-बांधवों को मार कर विजय प्राप्त की थी तब उन पर गौत्र हत्या का पाप लगा था। गौत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए स्वर्ग की ओर जा रहे पांडवों ने भी इसी स्थान पर अपने पितरों को तर्पण दिया था।


कोरोना वाइरस के वैश्विक संकट की वजह से इस बार बैंकुठ धाम बद्रीनाथ में श्राद्ध पक्ष के दौरान विगत वर्षों की तरह भीड नहीं है। कोविड-19 की वजह से सरकार द्वारा जारी निर्देशों के क्रम में सीमित संख्या में ही श्रद्धालुओं को धाम में आने की अनुमति मिल रही है।

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