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प्रत्येक व्यक्ति को जीते जी रक्तदान और मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प लेना चाहिए- डॉ राजे सिंह नेगी

 प्रत्येक व्यक्ति को जीते जी रक्तदान और मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प लेना चाहिए- डॉ राजे सिंह नेगी ऋषिकेश- राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा (25 अगस...

 प्रत्येक व्यक्ति को जीते जी रक्तदान और मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प लेना चाहिए- डॉ राजे सिंह नेगी



ऋषिकेश- राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा (25 अगस्त से 8 सितंबर) भले ही इस वर्ष वैश्विक महामारी कोरोना वायरस की भेंट चड़ गया हो।लेकिन लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक करने वालों के उत्साह में कोई कमी नही आई है। नेत्रदान जागरूकता कार्यक्रम चला रही तमाम संस्थाओं के साथ साथ समाजसेवी संगठन भी लोगों को व्यक्तिगत तौर पर नेत्रदान के प्रति जागरूक करने में जुटे हुए हैं।उड़ान फाउंडेशन के संस्थापक तीर्थ नगरी ऋषिकेश के नेत्र चिकित्सक डॉ राजे सिंह नेगी ने बताया कि कार्निया (पुतली) में होने वाली खराबी का एकमात्र इलाज है नेत्रदान। देश मे प्रत्येक वर्ष 25 अगस्त से 8 सितम्बर तक राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाता है। इसका उद्देश्य नेत्रदान के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना और लोगों को नेत्रदान करने के लिए प्रेरित करना है।बकौल डॉ नेगी के अनुसार आंख की पुतली (कॉर्निया) में चोट या किसी बीमारी के कारण कॉर्निया को क्षति होने पर दृष्टिहीनता को ठीक किया जा सकता है। प्रत्यारोपण में आँख में से क्षतिग्रस्त या खराब कॉर्निया को निकाल दिया जाता है और उसके स्थान पर एक स्वस्थ कॉर्निया प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। नगर के नेत्र चिकित्सक डॉ राजे सिंह नेगी के अनुसार नेत्रदान पखवाड़े के तहत लोगों को अपनी आंखें दान करने की शपथ लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो पुतली यानि कॉर्निया की बीमारी (कॉर्निया की क्षति जो आंखों की अगली परत है), मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी बीमारियां दृष्टि हानि और अंधापन के मुख्य कारणों में से एक है।वैसे माना जाता है कि अधिकतर दृष्टि की हानि के मामलों को नेत्रदान के जरिए उपचार करके ठीक किया जा सकता है किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके अलग अलग अंगों को दान दिया जा सकता है। उन अंगों को उन रोगियों में प्रत्यारोपित किया जाता है जिन्हें अंगों की जरूरत होती है किसी भी व्यक्ति के अंगों को उसकी मौत के बाद ही दान किया जाता है एक ऐसा ही प्रमुख अंग आंख भी है, मृत्यु के बाद नेत्रदान से कार्निया रहित व्यक्ति को रोशनी दी जा सकती है ।पीड़ित व्यक्ति के क्षतिग्रस्त कॉर्निया की जगह नेत्रदाता के स्वस्थ कॉर्निया को प्रत्यारोपित किया जाता है,भारत में नेत्रदान करने वालों की संख्या बेहद कम है जिसका मुख्य कारण सामान्य लोगों के बीच जागरूकता का अभाव तथा कई तरह के सामाजिक और धार्मिक मिथक भी है। जबकि कोई भी स्त्री-पुरूष मृत्यु के बाद ही नेत्रदान कर सकते हैं (चाहे वो कोई भी उम्र, लिंग, ब्लड ग्रुप, धर्म का हो) नेत्रदान का लाभ केवल कॉर्निया से नेत्रहीन व्यक्ति को होता है।उन्होंने बताया कि कॉर्निया को मृत्यु के छह घंटे के अंदर निकालना जरूरी है,कॉर्निया निकालने में सिर्फ 10-15 मिनट लगते हैं। इससे चेहरे पर भी कोई निशान नहीं आता।दान की गई आंखों को खरीदा या बेचा नहीं जाता है।पंजीकृत नेत्रदाता बनने के लिए नजदीक के नेत्र बैंक से संपर्क किया जा सकता है।

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