हंसी प्रहरी की अधूरी कहानी के पीछे का सच क्या है?

 हंसी की अधूरी कहानी के पीछे का सच क्या है?




अधूरा सत्य परोसना जितना खतरनाक होता है, उसे स्वीकार करना भी उतना ही नुकसानदेह होता है। हाल ही में कुमाऊं की हंसी प्रहरी की एक अधूरी करुण कथा मीडिया और सोशल मीडिया में देखने, पढ़ने को मिली। मीडिया रिपोर्ट्स पर संज्ञान लेते हुए सरकार ने हंसी के पुनर्वास को लेकर कदम उठाए हैं, यह सराहनीय है, लेकिन हंसी की कहानी को लेकर मैं असंतुष्ट हूं। अनेक सवाल मन में कौंध रहे हैं। लग रहा है कि कहानी के पीछे कोई बड़ी कहानी है। उस कहानी तक पहुंचने की मीडिया ने जहमत नहीं उठायी है, क्योंकि आज मीडिया में शोध की प्रवृत्ति और भूख समाप्त हो चुकी है। उसने एक उथले सत्य को परोस लिया, लेकिन उससे जुड़े सवाल यूं ही छोड़ दिए।

हंसी प्रहरी को हरिद्वार में दूसरों की दया पर जीते दिखाया गया है। कहीं-कहीं कहा गया कि हंसी खानाबदोश जीवन यापन कर रही थी। जिसने इस शब्द का इस्तेमाल किया, शायद उसने इसका अर्थ जानने का कष्ट नहीं उठाया। 

’खानाबदोश’ शब्द का अर्थ होता है एक ही स्थान पर न रहकर नित नए ठिकाने बदलना, जबकि हंसी हरिद्वार में रहकर लोगों से पैसा और भोजन मांगकर बालक के साथ अपना गुजारा कर रही थी। खानाबदोश शब्द दरिद्रता और गरीबी का द्योतक भी नहीं है।

खैर, अब आते हैं असल मुद्दे पर। बात यह है कि उत्तराखंड में भले ही पलायन और बेरोजगारी की मार क्यों न हो, यहां कोई कितना ही गरीब क्यों न हो, वह नंबर एक तो कभी भीख नहीं मांगता और दूसरी बात वह भूख से नहीं मरता, जबकि हंसी के बारे में बताया गया है कि वह अंग्रेजी और राजनीति विज्ञान से एमए है, कुमाऊं विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव और सांसद का चुनाव तक लड़ चुकी है। वह कुमाऊं यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरियन तक रह चुकी है।

असल सवाल यह है कि जब यहां दसवीं फेल्योर तक किसी न किसी प्रकार अपना गुजारा कर सकता है तो हंसी के सामने ऐसा क्या हो गया कि उसे कुमाऊं से अनेकों मील दूर आकर हरिद्वार में दूसरों के दिए भोजन पर आश्रित रहना पड़ गया? पहाड़ में कोई कितना ही गरीब क्यों न हो उसके पास पैतृक संपत्ति के नाम पर कोई मकान नही ंतो जमीन का छोटा-मोटा टुकड़ा तो होता ही है। 

राजस्व जमीन न भी हो तो गांव के निकट जंगलात की भूमि तो होती ही है, जहां पर कोई झोपड़ी इत्यादि बनाकर अपना ठिकाना जोड़ सकता है। गांव या शहर में करने के लिए के लिए कुछ न कुछ तो है ही। क्या डबल एमए पास महिला किसी निजी स्कूल में शिक्षक की नौकरी नहीं पा सकती है? भले ही वेतन 10-12 हजार रुपये ही क्यों न हो! सवाल यह भी है कि जब बाहर से आए अनेक लोग उत्तराखंड में छोटे-मोटे कार्य कर अपना और परिवार का पेट भर सकते हैं तो हंसी के लिए ऐसा क्या हो गया, जो वह ऐसा कुछ नहीं कर पायी? छात्र संघ और सांसद का चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार अचानक ऐसे अर्श से फर्श पर कैसे आ सकता है? पीजी पढ़े-लिखे आदमी के पास इतना दिमाग नहीं होता कि वह अपना कोई धंधा शुरू करे, भले ही उससे होने वाली आय पेट भरने लायक ही क्यों न हो।

इस मामले में हंसी की कहानी को दिखाकर उसका विस्थापन करवाने के लिए मीडिया को धन्यवाद दिया जा सकता है, लेकिन मामले की तह तक न जाने के लिए उसकी उतनी ही आलोचना भी की जानी चाहिए। हां, सोशल मीडिया से कुछ उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि यहां अधिकांश लोग अपनी जिम्मेदारी लाइक, कमेंट और फोटो तक ही मान लेते हैं। यहां मिश्र के काल्पनिक कवि अशरफ के काल्पनिक नाॅमिनेशन के बाद भले ही फेसबुक पर काव्य रचनाओं का मेला लग जाता है, लेकिन रचनाकार सत्य के अन्वेषण की जहमत नहीं उठाता है।

-डॉ.वीरेन्द्र बर्त्वाल, देहरादून

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