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Sunday, March 21, 2021

उत्तराखंड को बदनाम करने का रचा जा रहा बड़ा षड़यंत्र -जागो पहाड़ियों जागो

 उत्तराखंड को बदनाम करने का रचा जा रहा बड़ा षड़यंत्र-जागो पहाड़ियों जागो


प्रस्तावना-उत्तराखण्ड राज्य शहीदों के बलिदान से उपजा हुआ राज्य है और उत्तराखंड राज्य बनाने का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड का विकास था लेकिन हम उत्तराखण्डी आपसी जातिवाद क्षेत्रवाद भाई भतीजावाद में उलझ गए जिसका फायदा गैर पहाड़ी  उठा रहे हैं। इन दलालों का उद्देश्य यहां की सरकारों को ब्लैक मेलिंग करना और अस्थिर करना है जिसका खामियाजा उत्तराखंड की जनता को भुगतना पड़ रहा है और इन माफियाओं की चांदी कट रही है और वह माफिया लगातार पहाड़ियों को बदनाम करने में जुटे हैं-

साभार-प्रमोद कुमार रावत की फेसबुक वॉल से


सवाल उत्तराखंड की अस्मिता का !

उत्तराखंड के सियासत में दलाली की दुनिया का बेताज बादशाह बनने की होड़ में कुछ तथाकथित पत्रकारों ने शासन और सत्ता का जी भरकर दुरुपयोग किया। विश्वास के चोले के अंदर जब विष की शीशियां पाई गयी तो नेता और अधिकारियों के कान खड़े हो गए। आरटीआई, स्टिंग और हनीट्रैप के जरिए ये दलाल अपने-अपने नापाक मंसूबों को पूरा करते चले गए। छोटे बाबू से लेकर बड़े से बड़े बाबू और विधायक से लेकर मुख्यमंत्री तक इनकी तूती बोलने लगी। धीरे-धीरे इनके छुपे कैमरों में मुख्यमंत्रियों सहित कई नेता और अधिकारी कैद होने लग गए। इसके बाद कैमरों में कैद हुए स्टिंगो की बोलियाँ लगने लगी और स्टिंगबाज मालामाल होने लगे, कोई बीबी बच्चों के डर से मजबूर तो कोई जनता के आगे चेहरा दिखाने के डर से मजबूर। सबने स्टिंगबाजों के आगे सरेंडर कर दिया और खुलकर जनता की सारी सम्पति इन पर लुटाने लगे। इनकी दलाली में कुछ स्वार्थी नेता और अधिकारी इनके पार्टनर बन गए जिनकी बदौलत अपने आस-पास ये और शेखी बघारने लगे।  राज्य बनते ही दर्जन भर ऐसे लोग देहरादून में पत्रकार बनने आए और पत्रकार बनते-बनते दलाली और ब्लैकमेलिंग के बाजीगर बन गए। जिनके पास कुछ साल पहले तक एक स्कूटर नहीं होता था वो चार्टर्ड प्लेन से उड़ने लगे। उत्तराखंड में सारे पत्रकार क्या इनके आगे कम प्रतिभाशाली है, या फिर यही बड़े और असली पत्रकार है, जिन्होंने चंद सालों में इतनी अकूत संपत्ति कमा ली। 
आज खुद को पहाड़ और पहाड़ियों का सबसे बड़ा हितैषी बताने वाले स्वयंभू तथाकथितों की हकीकत और उनके नापाक मंसूबों को हर पहाड़ी को समझना चाहिए। अगर अब भी नहीं समझे तो आने वाले दिनों में सब को बहुत पछताना पड़ेगा। डर्ती पॉलिटिक्स की वजह से ऐसे लोग सीधे प्रदेश के मुखियाओं पर ऊँगली उठाते है और उनके राजनीतिक विरोधियों के मुखौटे बन जाते है। राजनीतिक विरोधी इस काम के लिए इन्हें बहुत सारा पैंसा और राजनीतिक संरक्षण भी देते है। प्रदेश में ऐसा कोई जगलर नहीं है जिसके सर पर किसी बड़े नेता और अधिकारी का हाथ न हो। ऐसे नेताओं और अधिकारियों का असली चेहरा पूरी जनता के सामने आना चाहिए और इनका राजनीतिक और सामाजिक विरोध होना चाहिए। ऐसे मुखौटे अपने आकाओं के कहने पर राज्य की सरकारों को अस्थिर करके प्रदेश और प्रदेश्वासियों का बेड़ा गर्क कर रहे है। जिस मुख्यमंत्री ने इनकी अवैध माँगे मान ली उसकी तरफ ये लोग चुप्पी साध लेते है और जो इनके झाँसे में नहीं आता उस पर ये पागल कुत्ते की तरह भौंकना शुरू कर देते है। इनका एकसूत्रीय कार्यक्रम सिर्फ भौंकना रहता है, इस काम के लिए इनको हड्डियाँ इनके आकाओं से मिलती रहती है। 
पहाड़ी न होकर भी अचानक पहाड़ियों के प्रति ऐसा प्रेम जागने का असली सच क्या है या फिर आज से पहले इस तरह का पहाड़ प्रेम क्यूँ नहीं दिखाया गया?
पहाड़ और पहाड़ियों का सबसे बड़े शुभचिंतक बनने वाले तथाकथित हितैषी उस समय कौन से बिलों में दुबके थे जब राज्य में भ्रष्टाचार की गंगा बह रही थी और दर्जनों घोटालों की खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बन रही थी। पहाड़ प्रेम का प्याला तब क्यूँ नहीं छलका था। क्या तब उत्तराखंड में सब कुछ अच्छा चल रहा था या यहाँ के अवाम की उस वक्त कोई समस्या ही नहीं थी। किस जगलर के क्या-क्या अवैध कार्य और कौन-कौन आका है ये बात यहाँ के हर कलमकार और पहाड़ के हितैषियों को पता है जो सोशल मीडिया पर अपने आप को पहाड़ का सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित करने की होड़ में रहते है लेकिन न जाने क्यूँ इनकी कलम ऐसे दलाल, ब्लैकमेलर और स्टिंगबाज़ों की सच्चाई लिखते वक्त इतनी भारी हो जाती है कि उनके लिए लिख पाना असंभव हो जाता है।
तिवारी सरकार से लेकर खंडूरी, निशंक, बहुगुणा और हरीश रावत की सरकार तक के उस दौर में उत्तराखंड में क्या-क्या नहीं हुआ था। उस वक्त कहाँ थे ये पहाड़ के लिए लड़ने वाले वीर, क्या इनके मुँह में आवाज नहीं थी या फिर इनको तब कलम चलानी नहीं आती थी। तब इन्होंने अपने मुँह क्यूँ सिल रखे थे, अरे अगर इतनी ही चिंता है तुम्हें पहाड़ और पहाड़ियों की तो आओ और एक वैसा ही आंदोलन का बिगुल बजाओ जैसे इस राज्य को बनाने के लिए आज से कई साल पहले बजाया था। है कोई माई का लाल जो सच का साथ देने और झूठ का पर्दाफ़ाश करने अपने सर पर कफन बांधे इस नई जंग की अगवाई कर सके। अगर है तो उत्तराखंड की पूरी जनता उसके साथ खड़ा होगी और नहीं है तो फिर ये फेसबुकिया पहाड़ प्रेम का नाटक करना छोड़ दो और राजनीतिक अस्थिरता फैला कर इस राज्य को बर्बाद मत करो वरना जिस दिन पहाड़ी जाग गए उस दिन धरती, आकाश और पाताल कहीं भी इन्हें छुपने के लिए जगह नहीं मिल पाएगी।