लैगि कुंभ फेर ऐंसु , हरिद्वार धाम-बेलीराम कंसवाल जी की शानदार कविता


सादर सेवा-सौळि दगड़्यों। आजकल कुम्भ मेळु लग्यूं च, त ये अवसर पर अपड़ि एक नईं कविता लीक तैं आप सबु का बीच उपस्थित छौं। आशा च आप तैं मेरी य कविता भी जरूर पसंद आलि।



लैगि    कुंभ    फेर    ऐंसु  ,  हरिद्वार    धाम।

भजदा   भगत   ऐक   यख , प्रभु   तेरो नाम।

कुंभ   की   कथा  सुणौंदु ,लगदु  के  यु  मेळु।

दुरु  दुरुन  औंदा  लोग , जुड़दु   के  यु थौळु।


जब  प्राण   संकट   मा  ऐन ,   इंद्र  देवराज। 

तबविष्णु जी की शरण गैन,छोड़ि राज काज।

समोदर    मथण    प्रभो  ,    उपाय    बताई। 

देवता   दैत्य  कट्ठा  सबुन , काज यू  निभाई। 


क्षीर    सागर    मथेगि  ,   समोदर  छोळेगी।

मंदराचल कि मथणी,बासुकी  नेतण बणीगे।

मुख   बटीन   दैंत   लैगि ,  नाग   तैं  खैंचण।

पुछड़ि   देबतौं   न   पकड़ि , लैगिन   मथण।


पर मंदराचल त डूबण लैगि,ह्वैगि बिघ्न भारी।

तब कच्छप  को  रूप  धैरि, विष्णु  अवतारी।

समोदर  मा  जैक   सारी ,  विपदा  दूर  कैरि।

पर्बत    उठैन    पीठी  ,  रिंगण   बैठि   रौड़ी।


पर इनु क्य ह्वै अनर्थ,कालकूट उबजि ग्यायी।

सृष्टि म  चौतरफा , त्राहि  त्राहि  मची  ग्यायी। 

धरती म तब  ऐन   शिबजि,  बागम्बर   धारी।

बिषपान    कैरि    प्रभु  ,   बचै   सृष्टि   सारी।


हलाहल   पीनि    सारू  , कंठ   मा  समायी।

तबरि  बटिन  बाबा  भोले , नीलकंठ   ह्वायी। 

फिर  त   एक   एक   कैक ,  कै  रतन   ऐन।

सुख    चैन    कैक   द्विई ,  दलौं   मा  बंटेन।


उच्चैश्रवा   घोड़ू    निकळि ,  ऐरावत   हाथी।

कामधेनु     कल्पवृक्ष  ,  डाळि     पारिजाति।

पांचजन्य  शंख    चंद्र ,  वारुणी  अर   रम्भा।

धन्वन्तरि   लक्ष्मी   जी ,  कौस्तु  मधु   कुम्भ। 


पर अमरत  देखिक तौंमा,  ह्वैगि  मारा  मार।

खैंचा तकड़ि  द्वि  दलौं  म , जुद्ध   ह्वै अपार।

घड़ु  उठैलि   देबतौं   न  , उड़ीग्या   आगास।

दैंत  पीछा  पीछी   तौंका , अमृता  का सास।   


कै  जगौं  त  तौमा ,  पौंठाजोड़ी  होण  लैगि।  

छीना  झपटी  अमरत,  कै  जगौं मा  खतेगी।  

कुछ    खतेणि   नासिक ,  उज्जैन   हरिद्वार। 

कुछ  खतेणी   तीरथों  का ,  राजा  परियाग।


जख  जख खतेणी , तख  लगदु  कुम्भ मेळु।

बारा बरसु  बाद  जुड़दु , यूँ  जगौं   मा थौळु।

सुख  शांति  चौतरफा , दुख   न  कै  बिमारी।

जस   कुशल  रौन  सब्बि , अर्ज  या  हमारी।।


रचना-

बेलीराम कनस्वाल 

भेट्टी, ग्यारह-गौं,घणसाळि,टीरी गढ़वाळ।

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