मौत के ये सौदागर सबसे बड़े गुनहगार-पढें और जानें

 मौत के ये सौदागर सबसे बड़े गुनहगार..

(वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार रावत की फेसबुक वॉल से)




हरिद्वार कुंभ के समाप्ति की घोषणा संतों और सरकारने अपने-अपने अंदाज में कर दी। कुंभ में जो होना था वो हो ही गया। किसी ने पाप धोए किसी ने पुण्य कमाए। कोई कोरोना का वायरस छोड़ के गया तो कोई लेकर गया। सरकार, शासन, प्रशासन, संत-समाज और मीडिया सबकी कुंभ की चिंता वाली जिम्मेदारी अगले अर्धकुंभ तक के लिए खत्म हो गयी लेकिन कोरोना का कुंभ कब समाप्त होगा और इसकी समाप्ति की घोषणा कौन करेगा यह सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है। “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा, हम बुलबुले है इसकी ये गुलिस्ताँ हमारा।”  प्रसिद्ध शायर मुहम्मद इकबाल द्वारा 1905 में लिखा ये गीत आज के हालात में सटीक बैठता है। हम आज वाकई बुलबुलों की तरह हो गए कौन कब फूट जाए किसी को पता नहीं। कोरोना महामारी में हजारों घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ गए है और लाखों लोग बरबाद हो गए है। इस वक्त कोई जिनकी सांसें बची है उनको लेकर इधर-उधर भाग रहा है तो कोई उनको जिनकी सांसे सदा के लिए थम गयी है। अस्पताल से लेकर शमशान तक लाइनें लगी है। मरने वालों ने कभी नहीं सोचा होगा कि मरने के बाद भी शरीर से मुक्ति पाने के लिए इतना इंतजार करना पड़ेगा। शहर से लेकर शमशान तक कोई उजड़ने में लगा हुआ है तो कोई उजाड़ने में। आखिर कौन है इस हालात का जिम्मेदार? क्या कोरोना वाइरस का जन्मदाता चीन ही अकेला गुनहगार है या इस देश के वो कर्णधार जो अपने आप को 135 करोड़ हिंदुस्तानियों का मसीहा समझते है उनका भी कोई दोष है या फिर देश के कोने-कोने में पल रहे वो आस्तीन के सांप भी इस महापाप के साझीदार है जो लॉकडाउन की खबर सुनते ही नारियल पानी की कीमत 50 रुपए से 100 रुपए कर देते हैं और डॉक्टरों द्वारा विटामिन सी अधिक लेने की कहने पर 50 रुपये प्रति किलो का नींबू 150 रुपये प्रति किलो बेचने लगते हैं l ऐसे लोगों को इंसान कहें या शैतान जो मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी सुनते ही ऑक्सीजन की कालाबाजारी शुरू कर देते हैं और दम तोड़ते मरीजों की दुर्दशा और जरुरत देखते ही जरुरी दवाओं की जमाख़ोरी करने लग जाते है और नकली रेमडेसिवीर इंजेक्शन को कई गुना ऊँचे दामों पर बेचकर उनकी जान ले लेते है। क्या इनका गुनाह माफ करने लायक है जो जो मरीज को कुछ किमी दूर किसी अस्पताल तक  पहुंचाने के लिए एंबुलेंस का किराया 20 से 25 हजार रुपए मांगते हैं और गरीबों को अपनों की लाशें कंधे पर ढोने के लिए मजबूर करते हैl  सियासतज़ादों पर ऐतबार करने का नतीजा तो हम कई दशकों से भुगत रहे है क्यूँकि लाशों पर राजनीति तो सियासत का पसंदीदा शौक रहा है लेकिन इंसानी वेश में लाशों का मांस नोचने वाले गिद्धों की इस जमात को क्या कहेंगे। गिद्ध तो मरने के बाद अपना पेट भरने के लिए लाशों को नोचते है पर ये तो अपनी तिजोरियां भरने के लिए जिंदा इंसानों को ही नोच रहे हैं l एक तरफ जहां किसी को कफन तक नसीब नहीं हो रहा है तो दूसरी तरफ लाशों के ऊपर से शाल और कफन चुराकर दुबारा बेचने वालों के लिए गिद्ध कहना भी बहुत कम लग रहा है। जिनको करनी थी आपदा से लड़ाई, वही करने लग गए आपदा में कमाई। कोरोना का प्रकोप पूरी दुनिया में फैला लेकिन हर जगह सिर्फ इंसान मरे, केवल हिंदुस्तान ही अकेला देश है जहां इंसान के साथ इंसानियत भी दफन हुई। अनहोनी कभी आवाज देकर नहीं आती इसलिए उसे आने से रोकना आसान नहीं लेकिन उसकी तबाही से एकजुट होकर बचा जा सकता है। जब टाईटेनिक समुद्र में डूब रहा था तो उसके आस पास तीन ऐसे जहाज़ मौजूद थे जो टाईटेनिक के मुसाफिरों को बचा सकते थे।

सबसे करीब जो जहाज़ मौजूद था उसका नाम सैमसन था और वो हादसे के वक्त टाईटेनिक से सिर्फ सात मील की दूरी पर था। सैमसन के कैप्टन ने न सिर्फ टाईटेनिक की ओर से फायर किए गए सफेद शोले (जो कि बेहद खतरे की हालत में हवा में फायर किये जाते हैं।) देखे थे, बल्कि टाईटेनिक के मुसाफिरों के चिल्लाने की आवाज़ को भी सुना था। लेकिन सैमसन के लोग गैर कानूनी तौर पर बेशकीमती समुद्री जीवों का शिकार कर रहे थे और नहीं चाहते थे कि पकड़े जाएं, इसलिए वे सब कुछ अनसुना और अनदेखा कर अपने जहाज़ को दूसरी तरफ़ मोड़ कर चले गए।

यह जहाज़ उन लोगों की तरह है जो अपनी गुनाहों भरी जिन्दगी में इतने मग़न हो जाते हैं कि उनके अंदर से इंसानियत कब खत्म हो जाती है उन्हें पता ही नहीं लगता।

दूसरा जहाज़ जो करीब मौजूद था उसका नाम कैलिफ़ॉरनियन था, जो हादसे के वक्त टाईटेनिक से मात्र चौदह मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन ने भी टाईटेनिक की ओर से निकल रहे सफेद शोले अपनी आखों से देखे,  क्योंकि टाईटेनिक उस वक्त बर्फ़ की चट्टानों से घिरा हुआ था और उसे टाईटेनिक तक पहुँचने के लिए उन चट्टानों के चक्कर काट कर जाना पड़ता, इसलिए वो कैप्टन सुबह होने का इन्तजार करने लगा।अगली सुबह जब वो टाईटेनिक की लोकेशन पर पहुंचा तो टाईटेनिक को समुद्र की तह में पहुंचे हुए चार घंटे गुज़र चुके थे और टाईटेनिक के कैप्टन एडवर्ड स्मिथ समेत 1569 मुसाफिर डूब चुके थे।

यह जहाज़ उन लोगों की तरह है जो किसी की मदद करने के लिए अपनी सहूलियत और आसानी देखते हैं और अगर हालात सही न हो तो अपना फर्ज भूल जाते हैं।

तीसरा जहाज़ कारफेथिया था जो टाईटेनिक से 68 मील दूर था, उस जहाज़ के कैप्टन आर्थो रोसट्रन ने रेडियो पर टाईटेनिक के मुसाफिरों की चीख पुकार सुनी, जबकि उसका जहाज़ दूसरी तरफ़ जा रहा था, उसने फौरन अपने जहाज़ का रुख मोड़ा और बर्फ़ की चट्टानों और खतरनाक़ मौसम की परवाह किए बगैर मदद के लिए रवाना हो गया। हालांकि वो दूर होने की वजह से टाईटेनिक के डूबने के दो घंटे बाद लोकेशन पर पहुंच पाया लेकिन यही वो जहाज़ था, जिसने लाईफ बोट्स की मदद से टाईटेनिक के बाकी 710 मुसाफिरों को जिन्दा बचाया था और उन्हें हिफाज़त के साथ न्यूयार्क पहुचा दिया था।

जिन्दगी में हमेशा मुश्किलें रहती हैं, संघर्ष रहते हैं लेकिन जो इन मुश्किलों और संघर्ष का सामना करते हुए भी इन्सानियत की भलाई के लिए कुछ कर जाए वही सच्चा इंसान कहलाता है। 

आज की हालात में जिस किसी ने भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी की मदद की है, समझिए उसने विश्व रूपी टाइटैनिक के डूबने से पहले जिंदगियां बचाने का पुण्य प्राप्त किया है।अभी संकट दूर नहीं हुआ है, अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है। हरिद्वार कुंभ के बाद कोरोना कुंभ में असली पुण्य कमाने का मौका है।

हमारे देश में कोरोना नहीं बल्कि इंसान ही इंसान को मार रहा है। आज हवा के लिए लूट खसोट मची है, कल पानी के लिए मारामारी होगी और परसों खाने के लिए हाहाकार मचेगा। अमीर की भरी हुई तिजोरी देखकर लालच आना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन गरीब को मरते देख उसकी किडनी बेचकर अपनी तिजोरी भरने की चाहत रखना बहुत बड़ा पाप है। देर तो हो चुकी है लेकिन अभी भी थोड़ा वक्त है। दल भक्ति, नेता भक्ति और जाति भक्ति छोड़ दो और सिर्फ राष्ट्र भक्ति अपनाओ अन्यथा इससे भी बुरे दिन देखने के लिए तैयार रहो। इस गुनाह के साझेदारों का भी पुरजोर विरोध करना होगा जो इंसानों के रूप में भेड़िए है और दूसरों की मजबूरी का नाजायज फ़ायदा उठा रहे है। इनका गुनाह देश पर घात लगाए आतंकवादी और दुश्मन देश का साथ देने वाले देशद्रोही से भी बढ़कर है क्यूँकि ये रक्षक के रूप में खुद ही भक्षक बने हुए है। दवा की शीशियों में जहर भरकर बेचने वाले मौत के ऐसे सौदागरों के हाथ पाँव काटकर चौराहे पर बिठा दिया जाना चाहिए ताकि वहां से गुजरने वाले वाले हर इंसान को पता चले सके कि इंसानियत का खून करने वालों का आखिर हश्र क्या होता है।

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