डाळी क्या च-विश्व प्रर्यावरण दिवस पर युवा कवि सुरेश स्नेही की कविता

                   डाळी




अल्सिगिन डाळि जू देखि छै ब्याळि,

भोळ तू बि रौ कि न रौ, यू याद रख्याळि,

न कुर्यौ यूंकि जलड़्यूं तैं, यून सूखि जाण,

बुलै नि सकदा इ यून, कनकै धै लगाण।


जब चलौन्दि तू दाथुड़ि त यूंका बि आंसू औन्दिन,

दिखेन्दा नीन क्वीत इ यखुळि रोणा रौन्दिन,

कैन सूण यूंकि खैरि, सब्बी त्वे जन छन यख,

सूखीक यूंकि फांगि त्वे फूकणा काम औन्दिन।


हिलैकि अपनी पातग्यू इ हव्वा देन्दिन त्वेतैं,

जलड़्यूं रिसैकि अपणि पाणि देन्दिन त्वेतैं,

घामपाणि मा यूंका छैल बैठि जान्दि तू,

बुबाकु सी साया यूं से मिल्दु त्वेतैं।


कूड़ा  बणौणु लाखड़ा डाल्यूं बटि लौन्दि,

बणैकि झोपड़ि अपणि खड़छौन छान्दि,

माळु का पत्तोंन बणैकि छांतड़ा,

रिंगाळि का बणया मान्दरौं मा सेन्दि।


न बिसरौ डाल्यूं कु कथग्या ऐसान च त्वे पर,

भकलौण्युं मा न औ कैकि, कुलाड़ि न चलौ यूं पर,

तरसि जाळि भोल जब डाळि नि राळि,

चेति जा अजुंबि न रौ लगिं यूं उजाण्ण पर ।


ठण्डा पाणि पेणु कु फिरीज बणैलिन त्वेन,

ठण्डि हव्वा खाणु कु पंखा बणैलिन त्वेन,

पर यूं से कथगि बिमारि होणि छन त्वेतैं,

डाल्यूं उकटौलि त हमेश तड़फुणु रौण त्वेन।


हर्या भर्या डाण्डा कांठा, कथग्या स्वाणा लगदन,

यूं देखुुणु देशु बटि कथगि मनखि यख औन्दन,

न उकटौ न उजाड़ यीं धरति कु श्रृंगार,

यीं स्वाणि धरति मा कथगि देबि देबता रौन्दिन।


सुरेश स्नेही।

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