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Friday, June 25, 2021

Exclusive-उत्तराखण्ड में कौन कर रहा फूट डालो-राज करो फार्मूला पर काम-देखिए पूरी रिपोर्ट

 Exclusive-उत्तराखण्ड में कौन कर रहा फूट डालो-राज करो फार्मूला  पर काम-देखिए पूरी रिपोर्ट


फूट डालो और राज करो, कल क्या होता है आज करो।

दुनिया को ठोकर मारो, और अपने सर पर पर ताज करो।।”

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार रावत की फेसबुक वॉल से



देश से अंग्रेजों को गए 70 साल से भी अधिक समय हो गया लेकिन उनकी कई आदतें और नीतियां हिंदुस्तानियों के खून में रच बस गयी है। फूट डालो और राज करो उन में से एक ऐसी नीति है जिसने घर की किचन से लेकर देश की संसद तक देशवासियों का बंटाधार करने की कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तराखंड में इस नीति का संक्रमण तिवारी सरकार के कार्यकाल पूरा होते ही यहां की सियासत में फैलने लग गया था। इसी नीति के अनुयायियों ने तिवारी के बाद किसी भी मुख्यमंत्री को उसके बाद अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 21 साल में चार महीने पहले बने 10वें मुख्यमंत्री तीरथ रावत की कुर्सी भी इसी नीति के साजिश का शिकार होती नजर आ रही है। 


पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस पद पर रहते रहते हुए भाजपा के प्रचंड बहुमत की सरकार को पूरे पांच साल चलाने की कोशिश की। इन्वेस्टर सम्मिट के बाद  त्रिवेंद्र ने हरिद्वार में होने वाले बड़े कुंभ मेले की व्यवस्थाओं को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए लगातार मैराथन बैठकों के साथ ही साधु संतों से संवाद इसलिए जारी रखा था कि धर्म के इस पावन पर्व में किसी तरह का व्यवधान उत्पन्न न हो सके। लेकिन कोरोना की दूसरी और जानलेवा लहर ने कुंभ को सीमित करने के उस फैसले को लेने के लिए त्रिवेंद्र को मजबूर कर दिया जिसमें कुंभ को सांकेतिक रखते हुए आरटीपीसीआर जांच के बिना प्रवेश के लिए मनाही थी। वो बात अलग है कि इस ऐतिहासिक पर्व के पूरा होने से चंद रोज पहले 9 मार्च को अचानक उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। त्रिवेंद्र को हटाने में पिछले तीन साल से जुटी भाजपा की ही फूट डालो राज करो वाली चौकड़ी के सपने उस समय धूल में मिल गए जब त्रिवेंद्र रावत की जगह तीरथ रावत को प्रदेश का नया सीएम बना दिया गया। त्रिवेंद्र को हटाना और तीरथ को मुख्यमंत्री बनाना, यह उत्तराखंड की सियासत में ऐसी मिस्ट्री है जिसका जवाब प्रदेश से लेकर केंद्र की भाजपा में किसी के पास नहीं है। तीरथ रावत का मुख्यमंत्री बनना सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला इसलिए भी रहा क्यूँकि वह उस चौकड़ी के हिस्सा नही थे जो पिछले साढ़े तीन साल से त्रिवेंद्र हटाओ मुहिम का बिगुल बजा रही थी। अपनी स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस नीति पर चलने वाले इन नेताओं का उत्तराखंड के अवाम से कभी भी कोई मतलब नहीं रहा है। इस चौकड़ी ने ही तीरथ रावत को सल्ट से चुनाव न लड़वाकर उनके सामने ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी कर दी है जिसका समाधान उन्हें तो क्या बड़े-बड़े राजनीतिक चाणक्यों को भी समझ नहीं आ रहा है।


तीरथ रावत के मुख्यमंत्री पद संभालते ही बिना जांच के ही कुंभ में आने का सबको न्योता और दो-तीन बयान उनके लिए उतने नुक़सानदायक साबित नहीं हुए जितने अब ये चौकड़ी के नेता हो रहे है। भाजपा अनुशासन समिति का डर इनसे उतने ही कोसों दूर है जितने पास 2022 के विधानसभा चुनाव है। इसलिए इन नेताओं पर अंकुश लगाना तीरथ रावत के लिए मुश्किल नहीं बल्कि नामुमकिन सा लग रहा है। मुख्यमंत्री की स्थिति चक्रव्यूह में घिरे उस अभिमन्यु की तरह हो गयी जो उसे तोड़ना तो चाहता है लेकिन तोड़ने का फिलहाल कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। कुछ दिन पहले तीरथ सरकार के भारी भरकम मंत्री सतपाल महाराज के हरिद्वार में एयरपोर्ट वाले बयान को सरकार के प्रवक्ता सुबोध उनियाल ने जिस तरह से मीडिया के सामने खारिज किया उससे महाराज की वाणी पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया। सुबोध का बयान महाराज को इतना नागवार गुजरा कि मीडिया के सामने आकर उन्हें अपने बयान की सत्यता साबित करनी पड़ी। रायपुर में विधायक निधि से तैयार कोविड अस्पताल और मालदेवता के पास नई सड़क के निर्माण के दौरान मलबे से हुए नुकसान को लेकर गणेश जोशी और उमेश शर्मा काऊ की तू तू मैं मैं और अब सुबोध और महाराज की नोक-झोंक ने सरकार की अंदरूनी घमासान को जनता के सामने उजागर कर दिया। 


चौकड़ी और उसके मायूस 'वेटिंग सीएम' लगातार इस फिराक में जुट हुए है कि किसी तरह पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों में फिरकापरस्ती पैदा की जाये और इन दोनों के बीच ऐसी खाई खोद दी जाए ताकि आपस में वो एक दूसरे की टांग खींचने में ही अपना वक्त और ताकत जाया कर दें। जिससे उनकी राह मिशन 2022 के लिये निष्कंटक हो सके। पूर्व सरकार की कई योजनाओं को रुकवाने के साथ-साथ कई फैसलों को पलटवाना भी चौकड़ी की साजिश का हिस्सा माना जा रहा है।

पिछले कुछ घटनाक्रमों पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि उक्त चौकड़ी जिसमें कुछ नौकरशाहों सहित सोशल मीडिया के तथाकथित दलाल पत्रकार भी शामिल हैं, अपनी इस साजिश को हवा देने में कामयाब रही है। इसके साथ ही उनको हरिद्वार कुंभ मेले में सामने आये कोरोना जांच फर्जीवाड़े ने एक और मौका दे दिया, जिसका सबूत पूर्व और वर्तमान सीएम द्वारा एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी है। कुंभ में कोविड जांच फर्जीवाड़े को लेकर तीरथ रावत ने कहा कि यह मामला उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले का है और इसकी पूरी जांच की जाएगी। जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होगी। उनके इस बयान पर त्रिवेंद्र रावत की प्रतिक्रिया भी सामने आई जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि मामले की न्यायिक जांच कराएं। घोटाला कब हुआ, ये जांच में साफ पता चल जाएगा। कोविड जांच में फर्जीवाड़ा सरासर हत्या के प्रयास का मामला है, जनता के सामने यह भी आना चाहिए कि असली दोषी कौन है और इसमें जो भी दोषी है उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।


इस तरह सीएम और पूर्व सीएम के बयानों की सियासी हलकों में खूब चर्चा हुई है। दिलचस्प बात यह है कि इस संवेदनशील मामले में अब तक की जांच में बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है। कुंभ में कोरोना जांच करने वाली कंपनी मैक्स कॉरपोरेट सर्विस की अपनी कोई खुद की लैब नहीं है उसने कागजों में नलवा लैबोरेटरीज, हिसार और डॉo लाल चंदानी लैब, दिल्ली के साथ अपना अनुबंध दिखाया हुआ है। सरकार द्वारा कोरोना जाँच करवाने की जिम्मेदारी ज़िला प्रशासन और मेला प्रशासन को सौंपी गई थी। मैक्स कंपनी ने पहले जिला प्रशासन में सूचीबद्धता के लिए आवेदन किया था लेकिन नियम-शर्तें पूरी न होने के कारण कंपनी का आवेदन ख़ारिज हो गया फिर मैक्स कॉरपोरेट सर्विस ने मेला प्रशासन में आवेदन किया और 26 मार्च को सूचीबद्धता लेकर 1 अप्रैल से जांच का कार्य शुरू भी कर दिया। इस प्रकरण में एक तरफ जहां त्रिवेंद्र के कार्यकाल से कोई कड़ी जुड़ती नजर नहीं आ रही है वहीं दूसरी तरफ भाजपा के कई बड़े नेताओं के साथ मैक्स कॉरपोरेट सर्विस के मालिक शरत पंत की तस्वीरें खूब वाइरल हुई है। शरत पंत के मामा केंद्रीय संसदीय मंत्री के पीए है । माना जा रहा है कि इन्ही संबंधों की वजह से बिना मानक पूरे किए ही इस कंपनी को इतना बड़ा और अहम कार्य सौंपा गया। शरत पिछले कई दिनों से अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट विधानसभा में भी काफी सक्रिय है। 


कुंभ कोरोना जांच घोटाले के सामने आते ही मुख्यमंत्री ने एक मंत्री के कहने पर बिना सही जानकारी लिए इसका ठीकरा पूर्व सीएम के सिर पर फोड़ तो दिया लेकिन कुंभ के दौरान जिन काबिल सरकारी अफसरों पर इन जांचों पर निगाह रखने की जिम्मेदारी थी, उनके बारे में उन्होंने अभी तक एक शब्द भी नहीं बोला है। जांच का खुलासे के बाद भी सरकार के प्रवक्ता सुबोध उनियाल मुख्यमंत्री के बयान को फिर एक बार रफू करते नजर आए जिसमें उन्होंने ने पहले से जांच कर रही उन लैबों का जिक्र किया है जिनको हरिद्वार जिले की सीमाओं सहित पांच जगह पर जांच का कार्य सौंपा गया है। लेकिन सरकार के प्रवक्ता ये भूल गए की जांच में फर्जीवाड़ा सिर्फ मैक्स कॉरपोरेट सर्विस कंपनी द्वारा किया गया गया है, जिसकी मेला प्रशासन के साथ सूचीबद्धता ही 26 मार्च को हुई है। सुबोध इससे पहले खुद 9 मार्च को पूर्व सरकार को टाटा बाय-बाय कर चुके है और कुंभ अधिसूचना जारी होने से पहले वर्तमान सरकार में नए अवतार में है। कुंभ कोरोना जांच फर्जीवाड़ा के बहाने भाजपा के पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्री को निशाने पर लेने और दोनों को आपस में भिड़ाकर 'कांटे से कांटा निकालने' के खेल के पीछे कौन लोग हैं, यह सीएम और पूर्व सीएम को भी समझना होगा क्योंकि यह समय उन लोगों को बेनकाब करने और उनके मंसूबे उजागर करना है जो फूट डालो और राज करो की नीति पर उत्तराखंड की अस्मिता से खेल रहे है नहीं तो मिशन 2022 उनके और भाजपा के लिये एक अग्निपरीक्षा साबित हो सकती है।