बण की बिपदा -उभरती कवित्री रिंकी काला की कविता

 बण की बिपदा '




कुळै डाळी अर बाजैं डाळी


आपस मा छुयी लगौंणी छिन


क्या पायी हौलु इथगा करि 


आपस मा पिड़ा बुझौणी छिन |

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बटौयूं तै छैल दिनी 


भूखौं तें खाणुं दिनी


हवा दिक सबुतैं पराण दिनी 


अपणु ल्वै-मासु चुल्लु जगौंणो दिनी 


सब करी - धरी भी 


हमारी पिड़ा कैन नी समझी


बणौं का बण फुक्यैगिन 


यीं आगे हाळ कैन नी समझी |


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कुळै  डाळी भी हुगांरा भरिक 


अपणा मनै अब रखणी च


बिधाता ते पुकारी अब 


प्रार्थना स्या या कन्नी च |

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हे बिधाता ! मेरी ना सही 


यौं जानबरों की पिड़ा त देख तू 


कन माँ अपणा बाळों तें 


आग मा जगदा द्येखणी ह्वेली 


यीं पिड़ा त समझ तू 


देख ये बणां राजो भी 


क्या हाल आज होयूं च 


अपणा आध फूक्या गात लीक 


यख तख सु भी भागणूं च |

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मनख्यूं सी भी अब आस नीन 


हे बिधाता मेरी पुकार सूंण तू 


बरखा कि बुंद बरखै क


यूं जानबारौ कु पराण  बचौ तू 


यू सभी - धाडी द्येखीक भी 


हमारी पिड़ा कैन नी समझी 


बणौं का बण फुक्यैगीन 


पर यीं आगै हाळ कैन नी समझी |


    


       ---@रिंकी काला, मयाली लस्या रूद्रप्रयाग 



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