Breaking News

Monday, June 14, 2021

मशकबीन ने लोकसंस्‍कृति में एक अधूरी जगह भरी-जनिए पूरी जानकारी

 मशकबीन ने लोकसंस्‍कृति में एक अधूरी जगह भरी

नमिता बिष्ट, युवा लेखिका



 रैबार पहाड़ का-प्राचीनकाल से ही प्रकृति के रूप में मौजूद संगीत के असीम स्त्रोत ने लोकगीत, लोक संगीत व लोक परम्पराओं को जन्म दिया हैं। किसी भी संस्कृति के लिए संगीत जरूरी होता हैं। संगीत या तो कंठ पर निर्भर है या वाद्य पर। सुर कंठ से निकलते है तो ताल के लिए साजों की जरूरत होती है। अगर बात की जाए देवभूमि उत्तराखण्ड़ कि तो यहां की लोक संस्कृति की शान यहां के लोक वाद्य यंत्र हैं। संस्कृति और गीत संगीत की परिभाषा पर्वतीय आंचल में बजाए जाने वाले लोक वाद्य यंत्रों के बिना नहीं की जा सकती हैं। उत्तराखण्ड़ में लोक गायन के अनुरूप लोगों ने अलग-अलग स्थानों में अलग- अलग तरह के वाद्य यंत्र बनाए हैं। जिन्हे अलग-अलग नामों से पहचान मिली है। इन्ही वाद्य यंत्रों में से एक यंत्र है मशकबीन।  जो भले ही एक विदेशी वाद्य यंत्र हो, लेकिन पहाड़ों की संस्कृति में रचा बसा तो बस उत्तराखंड का ही होकर रह गया। 


सबसे पहले प्रथम विश्व युद्ध में गए सैनिकों ने सीखी थी यह कला

मशकबीन स्कॉटलैण्ड़ का एक वाद्य यंत्र है। पहले विश्‍वयुद्ध में हिस्सा लेने गए गढ़वाली और कुमाउंनी सैनिकों ने मशकबीन को सीखा और इस कला को पहाड़ों में लेकर आए। लेकिन इसकी लोकप्रियता 20 वीं सदी में बढ़ी थी। दूसरे विश्‍वयुद्ध में भी कई गढ़वाली सैनिकों को मशकबीन मे प्रशिक्षित किया गया। ये वही सैनिक हैं जिन्हें इस बात का श्रेय जाता है कि इन लोगों ने मशकबीन को पहाड़ों में शादी-ब्याह जैसे समारोहों का हिस्सा बनाया। इसके बाद भारतीय सेना में मशकबीन के शामिल होने से इसका आकर्षण ओर बढ़ता गया। आज भी मशकबीन सेना बैण्डों का एक प्रमुख वाद्य हैं। इसमें एक साथ कई सुरों का समावेश होता है। अंग्रेजी में इसे बैंग पाइपर के नाम से जाना जाता है। यह एक चमडे से बनी थैली होती है। जिसमें चार छेद किए जाते हैं और तीन पाइप ऊपर की ओर, एक पाइप नीचे की ओर जोड़ा जाता है । साथ ही इसमें हवा भरने के लिए एक पाइप ओर डाला जाता है। इस पाइप में कोई भी छेद नहीं होता है। बाकी इसके चारों पाइपों में छेद होते हैं। इसमें फूंक मार कर हवा भरी जाती है, जो कंधे पर रखे अलग- अलग तीन पाइपों में जाती है। और जो पाइप नीचे की ओर होता है, उसमें छेद बने होते हैं। इन्ही छेदों से वादक धुने निकालता है।


मशकबीन की धुन सुनकर थिरकने लगते हैं पैर

उत्‍तराखंड के परंपरागत वाद्य समूह में ढोल, नगाड़ा, डमरू, थाली, हुड़का आदि तो थे, लेकिन फूंक से बजने वाला कोई सुरीला वाद्य नहीं था। मशकबीन ने सुरों की इस कमी को पूरा किया और उत्तराखंड लोकसंस्कृति का हिस्सा बन गया। यो वो मशकबीन है जो कुमाऊं में छोलिया नृत्य और गढ़वाल में पौणा नृत्य में नाचने वालों की कदमताल की खूबसूरती बढ़ा देता है। विवाह जैसे मांगलिक आयोजनों से लेकर मेले, त्योहार, कौथिग आदि उल्लास के मौकों पर इसके सुर रस घोल देते हैं। ढोल-दमाऊ के साथ वादक जब मशकबीन में 'बेडू पाको बारामासा', 'टक-टका-टक कमला', 'कैले बजे मुरूली ओ बैणा ऊंची-ऊंची डान्यूं मा' जैसे लोकगीतों की धुन बजाता है तो बस कदम खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं।


दिखता है अंग्रेजों की सिखलाई का असर


आज भी सुदूर पर्वतीय अंचल में पुराने वादकों को मशकबीन पर स्कॉटिश धुनें बजाते हुए सुना जा सकता है। हालांकि उन्हें इसका इल्म नहीं रहता कि वे कहां की धुन बजा रहे हैं। खैर, मशकबीन का मूल कहीं भी हो, लेकिन जिस तरह से इसे बजाने की कला उत्तराखंड में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती चली गई, उसने इसे उत्तराखंड के लोकवाद्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। लेकिन अब समय के साथ पुराने वाद्य यंत्रों की जगह आधुनिक वाद्य यंत्रो ने ले ली है। जिससे पुराने वाद्य यंत्रों की छवि धूमिल पडती जा रही है।



विलुप्ती की कगार पर पहाडी बीनबाजा

आज उत्तराखण्ड़ में लोक वाद्य गुमनामी के बीहड़ में भटक रहे हैं। वहीं मशकबीन भी प्रचलन से बाहर होते जा रहे हैं। परंपरा में रच बस जाने के बावजूद बदलते वक्‍त में लोकवाद्यों पर पैदा हुए संकट का असर मशकबीन पर भी दिखता है। इनकी जगह इलेक्ट्रानीक उपकरणो ने ले ली है। विवाह समारोह आदि में डीजे संस्कृति हावी होने लगी है। जिसके चलते नयी पीडियां भी डिजीटल इंड़िया के दौर में परंपरागत वाद्य यंत्र एंव पुरानी संस्कृति को भूलती जा रही है। उत्तराखण्ड के वाद्य यंत्रों को सिर्फ भारत ही नहीं विदेशों में भी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। लेकिन दुख की बात यह है कि आज यह विलुप्ती की कगार पर हैं। इन्हें न तो अब कोई सिखाने वाला बचा है और न कोई सीखने वाला है। नयी पीडियां अपने पांरपरिक वाद्य यंत्रों को अपनाने से हाथ पीछे खिंच रही है। 


गांवों में अभी भी उम्मीद की किरण जीवित 

आज भले ही पारंपरिक वाद्य यंत्रों का अस्तित्व संकट में है, लेकिन गांवों में अभी भी उम्मीद की किरण जीवित है। पहाडों में कुछ जगह पर आज भी कुछ लोगों के प्रयास से मशकबीन चलन में है। जिसको बजाने वाले अब कुछ ही कलाकार रह गए हैं। जो मशकबीन बजा कर अपनी रोजी-रोटी का जरिया बनाए हुए है । वहीं परम्परागत वाद्य यंत्रों को जीवित रखने में भी अपना अहम योगदान दे रहे हैं। वहीं उत्तराखंड में विलुप्त होती लोककलाओं को सहेजने के लिए सरकार सक्रिय हो गई है। सरकार राज्य के परंपरागत ढोलवादकों को प्रोत्साहित करने के साथ ही उनकी पारंपरिक विधा को संरक्षण देने की पहल कर रही है।