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Saturday, July 03, 2021

हार के भय की छटपटाहट से निकला नया मुख्यमंत्री ?-बागी नेताओं को फिर न करनी पड़े बगावत

 हार के भय की छटपटाहट से निकला नया मुख्यमंत्री ?

  • युवा तेज तर्रार और इमानदार व्यवहारिक नेता है धामी
  • पुष्कर सिंह धामी के सामने कई बड़ी चुनौतियां
  • कांग्रेस के बागियों को साथ लेकर चलना बड़ी चुनौती
  • 2022 का विधान सभा चुनाव जीतना पुष्कर सिंह धामी के लिए अग्नि परीक्षा
  • व्यूरोक्रेसी पर लगाम लगाना, संतुलित मंत्रीमंडल का गठन करना



भारी भरकम चुनावी जीत मिलने के बावजूद उत्तराखंड राज्य को अस्थिरता के भंवर में डालने के पाप से भारतीय जनता पार्टी को कैसे निजात मिलेगी यह तो आने वाला वक़्त बताएगा. लेकिन जो मजाक भाजपा ने उत्तराखंड की जनता के साथ किया है इसका प्रतिफल तो पार्टी को मिलेगा ही. भाजपा ने पार्टी कैडर से जुड़े युवा नेता पुष्कर धामी को नया मुख्यमंत्री बना तो दिया है लेकिन अंदरखाने पार्टी के अन्दर घबराहट का दौर शुरु हो  चूका है. बर्तमान विधायकों को कतई भी भरोसा नहीं लग रहा है कि धामी जी के नेतृत्व में पार्टी क्या सत्ता में वापस आ जायेगी. इसका सीधा सा अर्थ हुआ की विधायकों को अपने ही बलबूते पर चुनाव जीतकर आना होगा. 


अब मोदी फैक्टर का करिश्मा भी पहले जैसा नहीं रहा. सबसे बड़ा गलत निर्णय भाजपा हाईकमान ने त्रिवेन्द्र रावत को हटाया, त्रिवेन्द्र पर ऐसे कोई गंभीर आरोप प्रत्यारोप नहीं थे, सिर्फ ये कारण कि इनके नेतृत्व में भाजपा दुबारा वापस सत्ता में नहीं आ सकती. इसका भी नए मुख्यमंत्री तीरथ रावत को लाकर कोई समाधान नहीं था तो फिर त्रिवेन्द्र को क्यों बदला? आज राज्य में हर जगह यही चर्चा है. और अब पुष्कर धामी जैसे युवा  नेता को मुख्यमंत्री बना दिया गया है तो भाजपा क्या सन्देश देना चाहती है. कुल मिलाकर भाजपा पार्टी  हाईकमान गलती पर गलती करती जा रही है.  और इस वजह से उत्तराखंड भाजपा गर्त की और यानी हार की और कदम दर कदम बढाती जा रही है. और कांग्रेस बैठे बिठाये सत्ता की और आगे सरकती जा रही है. जैसे – जैसे समय आगे बढ़ता जा रहा है, कांग्रेस से भाजपा में आये विधायको मंत्रियों में छटपटाहट पहले से ही थी पर अब बैचैनी बढ़ गयी है. 


युवा धामी को मुख्यमंत्री बनाकर यह स्पस्ट कर दिया गया है कि अब तुम चाहे कितने ही सीनियर हो, कदावर हो तुमारे लिये भाजपा में कोई स्कोप नहीं रह गया है. तीरथ मंत्रिमंडल में बुजुर्ग विधायकों जैसे बंसीधर भगत, बिसन सिंह चुफाल को मंत्रिमंडल में शामिल करना भी यही संकेत था. जहाँ तक योग्यता की बात है भाजपा में इसकी कोई मान्यता नहीं है. नहीं तो मुन्ना सिंह चौहान जैसे लोग खाली हाथ नहीं बैठे होते. भाजपा कैडर बेस्ड पार्टी है वो कैडर को लेकर ही आगे बढ़ना चाहती है तब वो चाहे तीरथ हो या धामी. अब भाजपा में हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, यशपाल आर्य आदि जैसे नेताओं के लिये इस बार तो मंत्री भी बन गए अगली बार ले दे कर विधायक बन भी गए तो मंत्री बनने के लाले पड़ने वाले है. अब इन नेताओं की छटपटाहट और बढ़ गयी है. पिछले काफी समय से अंदरखाने सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है कि ये सब लोग पाला बदलने की फ़िराक में है. 


ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्रियों की अदला बदली से उपजे हालातों से राज्य व केंद्र के भाजपा के नेता अनभिग्य है, बर्तमान हालातों ने पार्टी को मजबूर कर दिया है कि अब चाहे जीते या हारें पर होगा अपना कैडर का ही नेता. नहीं तो भाजपा के पास आज भी ऐसे जीताऊ नेता थे जिन्हें मुख्यमंत्री बनाया जा सकता था व जो पार्टी को दुबारा सत्ता दिलाने में सहायक हो सकता था. अथ: भाजपा को एक बार फिर उत्तराखंड में मोदी के ही भरोसे चुनाव में उतरना है. 


धामी को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे कांग्रेस के कदावर नेता भूतपूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी साधना है व कुमाओं को यह सन्देश देना था कि पार्टी ने बहुत समय बाद ही सही कोश्यारी के बाद कुमाओं को भी धामी के रूप में मुख्यमंत्री दे दिया है. भाजपा को हरीश रावत के नाम से अभी से पसीने छुटने लगे है, यह यही संकेत है की अंदरखाने पार्टी का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ है. भाजपा भले ही सल्ट से जीत गयी हो लेकिन तीरथ को वहां से जिताने की पार्टी की हिम्मत नहीं हो पायी न खुद तीरथ को वहां से जीतने का भरोषा था, जब गंगोत्री की बाते चली तो वहां भी तीरथ के जीतने की संभावना नहीं लगी, तो भाजपा को हार का इतना डर लगा कि संवेधानिक संकट का बहाना लेकर मुख्यमंत्री को ही बदलना पड़ा. सत्ता के मोह में चूर भाजपा ने यह योजना नहीं बनायी कि सबसे पहले मुख्यमंत्री को किसी भी हालत में जल्दी से जल्दी विधायक बनवा लिया जाये व जनता को अस्थिरता के दौर से बाहर निकाला जाये. प्रदेश को ८ मुख्यमंत्री देने वाली पार्टी किस मुह से चुनाव में जाने वाली है. इसका सामना पार्टी को आने वाले चुनाव में करना होगा. 


नए मुख्यमंत्री से कोई चमत्कार होगा ऐसी फिलहाल जनता को आशा नहीं है. ५७ विधायको को जनता ने चुनकर भाजपा को दिया और उसका हस्र ये रहा कि  एक ढंग का मुख्यमंत्री तक पार्टी नहीं दे पायी व राज्य को बार - बार अस्थिरता के दौर में ले गयी. उत्तराखंड को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाने वाले भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को यह तो समझना होगा की विधायकों को तो आप चुप करा सकते हो लेकिन जनता की भावनाओं से खेलकर जो पाप आपने किया है उसके भुक्तभोगी भी आप ही होंगे न भाजपा का कार्यकर्त्ता और न ही जनता. 


जयप्रकाश पंवार ‘जेपी’

(स्वतंत्र पत्रकार)