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Friday, July 16, 2021

खुश खुशहाली का पर्व है, '' हरेला"--ममगाईं

              खुश खुशहाली का पर्व   है, '' हरेला"--ममगाईं



  हरेला पर्व सुख समृद्धि की कामना का पर्व है, दूसरों को आशीर्वाद देने का पर्व है ,तथा खुशियों के द्वारा खिलखिलाने का पर्व है। दूसरों को आशीर्वाद दें, स्वयम खुश रहें , यह संदेश देता है यह पर्व। यूँ तो विश्व मे तीन बार मनाया जाता है लेकिन श्रावण संक्रांति का महत्व अलग है । अपनों के लिए शुभकामनाएं देते हैं। आजकल  गुप्त नवरात्रे चल रहे हैं, इसलिए इस पर्व की और भी महता बढ़ जाती है ।

आज कटोलस्यूं सुमाडी श्रीनगर में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान प्रसिद्ध कथा वाचक आचार्य शिवप्रसाद ममगाई जी ने फलदार वृक्ष आम आंवला के पेड़ ग्राम वासियो के साथ लगाए। वहीं कथा प्रवचन में ममगाईं ने कहा, कलयुग में भगवान का पावन नान ही कल्याण का सबसे सुगम रास्ता है , जो एकाग्र चित से भगवान के नाम का जप करता है भगवान उसके जीवन के सारे कष्टों को हरलेते हैं। भगवान की भक्ति करने के लिए दर दर भटकने जी जरूरत नही है घरमे बैठ कर भी भक्ति की जा सकती है, चंचल हृदय वालों को परमात्मा की प्राप्ति नही होती है।

उक्त विचार पट्टी कटलोसयुं सुमाड़ी ग्राम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में व्यक्त करते हुए कहा कि गुरु केवल सिर पर हाथ रख करके मनुष्य का कल्याण कर देंगे यह भ्रम है, सच्चा गुरु वह है जो भगवान की भक्ति का महत्व बता कर मनुष्य को शारीरिकता व सरलता की ओर ले जाय ,इससे वह अपने जीवन ने ईमानदारी से जीवीका पालन का प्रेरणा स्रोत बनें।  पाखंडियो के पास फटकना भी पाप है,  भारतवर्ष तबतक स्वाधीन नही मन जाएगा जब तक इस धरा धाम पर गौ हत्या ,भूर्ण हत्या बन्द नही होंगे , आत्मा ही जीवन शक्ति है इसको प्राप्त न करने की शक्ति के कारण यह शरीर जड़ गो जाता , यह आत्मा यह चेतना प्राणी मात्र के अन्तःस्थल में विराजमान है। यही हमारा असली स्वरूप है, हम अज्ञानता वस अपने शरीर को ही स्वयम मान लेते हैं , यही हमारे अज्ञान की शुद्धि के लिए या निवृति के लिए चित की शुद्धि आवश्यक है ध्यान अवस्था हमारी चित वृत्तियों को आध्यत्म की ओर ले जाती हैं , वेदव्यास जी ने समस्त ज्ञान मार्ग सम्पन ग्रंथो का सृजन कर आत्मिक शांति के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की।हमारी आत्मा को प्रभु की छाया मात्र मन गया , कंस का मतलब हमारे शरीर का अहंकार है, स्वार्थ वस संबंध जोड़ना ही कंस है आकाशवाणी के कहने पर देवकी इसके काल को पैदा करेगी, यह देवकी को मारने पर यतरु हो गया यह वृत्ति आजकल समाज मे दिखाई देने लगी है। भक्ति मार्ग का ज्ञान करती है, केवल भगवान कहकर भगवान तक नही पहुँचा जा सकता। 

वही आज कथा में आज श्री रमाकांत काला, मुकेश कला, राकेश काला, प्रदीप काला, प्रभा काला, उषा काला, बविता काला, अंजू काला,  तनुश्री , देवांश, अभय, दृष्टि, वेदांस नंदिनी,  कार्तिक कला आचार्य श्री रतीश काला , आचार्य , दुर्गेश बहुगुणा, आचार्य, ललित मोहन, रंजना काला, सत्यदेव बहुगुणा, विनोद चमोली, प्रेमदत्त पोखरियालआदि उपास्थि रहे और पूर्ण रूप से श्रीमद्भागवत कथा का भरपूर आनन्द लिया ।