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Tuesday, July 06, 2021

बाहर के अफसर,पहाड़ के बाबू-सीएम सहाब बेलगाम अफसरशाही को करना होगा अब काबू

 बाहर के अफसर,पहाड़ के बाबू-सीएम सहाब बेलगाम अफसरशाही को करना होगा अब  काबू


 (वरिष्ठ पत्रकार डॉ.वीरेंद्र बर्त्वाल,की फेसबुक वॉल से)




रैबार पहाड़ का-उत्तराखंड में मुख्यसचिव पद से ओमप्रकाश की विदाई और इस पद पर केंद्र से आए एसएस संधू की तैनाती पर खील-बताशे बांटे जा रहे हैं (इसमें कोई दोराय नहीं कि संधू जी एक योग्य आधिकारी हैं)। उत्तराखंड के एक बडे़ अफसर के जाने और दूसरे के आने पर दीवाली जैसा माहौल महज एक घटना और हंसी-खुशी का खेल नहीं,बल्कि उत्तराखंड को गर्त में ले जाने वालों के विरुद्ध एक भावनात्मक विस्फोट का झीना-सा रूप है। 

सभी जानते हैं कि राज्य को चलाने में विधायिका के साथ ही ब्यूरोक्रेट्स का भी अहम योगदान होता है। और उत्तराखंड में अनेक बडे़ अफसरों की धींगामुश्ती इस कदर हावी रही कि वे विधायक और मंत्रियों को कीडे़-मकोड़ों से अधिक कुछ नहीं समझते। गाहे-बगाहे मुख्यमंत्रियों तक भी विधायक-मंत्रियों का यह दुःखडा़ पहुंचता रहा, पर हुआ कुछ नहीं। मुद्दा-मसला यह भी बना की बाहर की आईएएस लॉबी उत्तराखंड के विकास कार्यों में हीलाहवाली करती है,लेकिन जानकारी होने पर भी प्रमाण न होने से इस पर भी क्या हो सकता था?  बाहर के अफसरों की धींगामुश्ती से इन्कार नहीं किया जा सकता है,लेकिन हमारे भी कौन-से गंगाजल का आचमन लेकर काम करते हैं! इसकी पुष्टि के लिए एक प्रमाण प्रस्तुत कर रहा हूं।

लगभग छह साल पहले मैं जनहित के एक काम से सचिवालय गया था। वहाँ एक पहाडी़ बाबू जूते पहने पैरों को टेबल पर रखकर आराम फरमा रहा था। उसके जूतों से फिसली कुछ धूल मेज पर रखी फाइलों को ललकार रही थी और कंप्यूटर का मुंह चिढ़ा रही थी। कमरे में दाखिल होकर उस बाबू से मैंने अपने मसले पर बात की तो वह तमतमा गया। उसकी बातों और अभद्र शब्दों से झलक रहा था कि मैंने उसकी तंद्रा भंग करने का अक्षम्य अपराध किया है। उस बाबू की औकात समझकर मैंने विवाद को बढा़ने से वहीं रोक दिया।

बात उस सचिवालय वाले बाबू की ही नहीं, मशाल जलाकर खोजने निकलोगे तो लगभग 30 फीसदी पहाड़ी बाबू आज भी ऐसे ही मिलेंगे। क्या इन्हें भी ओमप्रकाश की तरह विदा किया जा सकता है? वैसे किसी राज्य के अफसर और बाबू चाहें तो कम सुविधाओं के बावजूद भी राज्य को सिरमौर बना सकते हैं। पहाड़ी राज्य हिमाचल विकास के ऊंचे पायदान पर इसलिए पहुंचा कि वहाँ के कार्मिकों ने भी इसके लिए कठिन परिश्रम और त्याग किया है। हिमाचल के गठन के बाद कई वर्षों तक वहाँ के कार्मिकों को वेतन नहीं मिला तो भी उन्होंने इस समस्या को सहर्ष आत्मसाथ कर लिया,परंतु उत्तराखंड में एक बार सचिवालय में छह दिन का हफ्ता किए जाने से 'मुर्दाबाद'की नौबत आ गयी थी। 

अपणा नि द्यखण नाक पर,हैका का द्यखण फिफिंडों पर

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