विश्लेषण-पार्टियाँ ओंन मतदाता मौन-सरकार बनायेगा कौन?

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जयप्रकाश पंवार ‘जेपी’ वरिष्ठ राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार

सर्द मौसम में चुनावों की गर्मी भी ठंडी बयार हो गयी जैसी लग रही है. ओमिक्रोम के खतरे के बीच चुनाव आयोग ने भीड़ भाड़ जुटाने, हो हुल्लड़ पर रोक से प्रत्यासियो के मंसूबों पर बर्फ जमा दी. इस बार किसी भी पार्टी के प्रति लहर जैसी कोई बात नहीं दिख रही है. भले ही प्रमुख दलों व अन्य चुनावी गणित चल रही हो लेकिन इस बार मतदाता शांत बैठा हुआ है वो किसी भी दल के बारे में खुलकर अपनी राय ब्यक्त नहीं कर रहा है. उत्तराखंड के मतदाता के इस रुख से दोनों प्रमुख दलों के माथे पर जोर का बल पढ चूका है, खासकर सताधारी भाजपा के लिये यह चुनाव अपनी व मोदी की छवि को पुनर्स्थापित करने का होगा वही, कांग्रेस के लिये खोने से ज्यादा सत्ता में वापसी कैसे हो इस पर नज़र है. अब वर्चुअल बैठकों से अब पार्टियाँ कितने मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचा पाएगी व वे जनता को कितना प्रभावित कर पाएंगे यह भी देखने वाली बात होगी. इस बार मतदान के दिन ओमिक्रों के खतरे, ठंड, बारिस, बर्फवारी की आशंकाओं के मधेनजर कितने मतदाता मत डालने के प्रति उत्सुक रहेंगे यह भी एक बड़ी चुनौती होने जा रही है. नामांकन के बाद मुस्किल से 10 दिन ही प्रत्यासियों को अपने पक्ष में प्रचार, रैलियां करने का मौका मिलेगा.

जिस तरह से दोनों प्रमुख पार्टियों में एक दूसरे के नेताओं को अपने पक्ष में झटकने – पटकने का खेला चला है इस तरह की हरकतों ने मतदाताओं का राजनीति व पार्टियों से मोह भंग पैदा कर दिया है. अब भाजपा व कांग्रेस में कोई फर्क नहीं रह गया है. दोनों पार्टियों के नाम भले अलग हों लेकिन नीति, नियम, विचार व सिधान्तों में भी कोई अंतर मतदाताओं को नज़र नहीं आता दिख रहा है. सायद यही वो कारन व कारक हैं की मतदाताओं ने चुप्पी ओढ़ ली है. लेकिन इस सब के बावजूद चुनाव भी होंगे व सरकार भी बनेगी अब चाहे मतदान कम हो या ज्यादा पर दोनों प्रमुख पार्टियों को यह अहसास हो चूका है की कुछ अप्रत्यासित नहीं होने जा रहा है. दोनों पार्टियों की जीत का अंतर इस तरह रहने की संभावनाएं जताई जा रही है की अगर कोई निर्दलीय जीत कर आता है तो उसके भाव आसमान चढ़ जायेंगे. यह भी हो सकता है की उत्तराखंड की जनता इस बार कुछ नया देखने को भी विवस हो सकती है. भाजपा ने जहाँ अधिकांश अपने पुराने विधायकों पर भरोषा जताया है वही कांग्रेस ने अपने निवर्तमान विधायकों को रिपीट कर पुराने विधायकों को ही टिकेट दिया है, इस लिहाज से अधिकांश प्रत्यासियों से जनता अवगत है. निश्चित रूप से सत्ताधारी पार्टी के प्रति एंटी इन्कवेंसी तो रहेगी ही, तो अपने निवर्तमान विधायकों को टिकेट देकर भाजपा ने एक बड़ा रिस्क लिया है, यह चुनावी गणित तो भाजपा से बेहतर कोई और बता नहीं सकता. कांग्रस के पास खोने के लिये कुछ नहीं हैं, वहीँ अन्य दलों के पास जीतने की आस कुछ ख़ास नहीं नज़र नहीं आ रही है.

जिस तरह से इस बार कोरोना काल में चुनाव हो रहे हैं उस लिहाज से चुनावी रैलियां, प्रचार – प्रसार की ब्यापक संभावनाएं कम हो गयी है, अब इस बार पार्टियाँ परिवारों तक ब्यक्तिगत रूप से मिठाई के डिब्बे लेकर पहुचने की जुगत में होगी, मतदाताओं के हिसाब से फिर हिसाब किताब होगा जो ज्यादा देगा वह पार्टी फायदे में रहेगी इसके अतिरिक्त ज्यादा सोचने के लिये कुछ रह नहीं जाता है. उत्तराखंड की इन राजनीतिक परिस्थितियों में विकास के मुद्दों पर चुनाव होंगे यह सब बेकार की बातें है. फिलहाल इन्तजार कीजिये और ईमानदारी से जनता स्वीकार करे की वे भी हमाम में नंगी हो चुकी है. बस यही अपेक्षा है की इसी उधेड़बुन से सायद कोई नया रास्ता निकले.

अंतत:
आखिरकार जो अपेक्षित था वही हुआ भी, राजनीती सुचिता की जो ध्वजियाँ उडनी थी उड़ चुकी है. इससे एक बात स्पष्ट हो गयी कि जो राजनीतिक पार्टियाँ है उनके कोई सिधांत नहीं रह गए हैं. इस लिहाज से राज्य की दो प्रमुख पार्टिया भाजपा व कांग्रेस अगर सिधान्तों की बात करती हैं तो उस पर जनता को विस्वास नहीं करना चाहिए. जिस तरह की भगदड़ बाजी दोनों पार्टियों में देखने को मिली उससे राजनीति के प्रति जनता का मोह भंग होता जा रहा है यह भारतीय लोकतंत्र के लिये बहुत बड़ी चिंता की बात है. अब अगर आज ये स्थिति पैदा हुई है तो जनता को खुद इसका विश्लेषण करना चाहिए की आखिरकार इसका दोषी कौन है. इमानदारी से जनता को स्वीकार करना होगा की राजनितिक दलों, नेताओं से ज्यादा जनता खुद आज की राजनितिक परिस्थितियों के लिये दोषी है. कहा भी गया है की यथा प्रजा तथा राजा. जैसी जनता वैसा ही जनप्रतिनिधि चुन कर आ रहा है. कुछ उदाहरणों को छोड़ भी दे तो जिस भी विधानसभा के प्रतिनिधि की जब जानकारी प्राप्त करते है तो पता चलता है की वो तो बड़ा भू माफिया, ठेकेदार, गलेदार, दलाल, बेईमान, दलबदलू निकला. इस श्रेणी में कई कुख्यात नेता हमारे हर दलों में आज से नहीं कई सालों से जमे हुए है. जनता ये भी जानती है कि ये जो विधायक जी या मंत्री है अचानक रातों रात करोड़पति कैसे बन जाता है. नेता खुद तो भ्रस्टाचार के दल-दल में घुसा ही है वह धीरे-धीरे जनता को भी उस दल-दल में शामिल कर लेता है और धीरे-धीरे जनता में भ्रस्टाचार की संस्कृति पनप जाती है और समाज इसका आदी हो जाता है. ऐसा होने से विकास के सारे दावों की पोल पट्टी खुल जाती है और भुगतना जनता को पड़ता है.

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